गीता प्रवचन के छठे दिन स्वामी जी ने आत्मा, मन और इंद्रियों के माध्यम से समझाया जीवन का आध्यात्मिक रहस्य


हनुमानगढ़। श्री कल्याण कमल आश्रम, हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज ने गीता प्रवचन कार्यक्रम के छठे दिन श्रद्धालुओं को शरीर, आत्मा, मन और इंद्रियों के संबंध का आध्यात्मिक महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि हमारा शरीर रथ के समान है, इंद्रियां उसके घोड़े हैं और मन लगाम के समान है। आत्मा इस रथ की स्वामी है, जबकि भगवान श्रीकृष्ण सारथी बनकर जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। विशाल श्रद्धालु समूह को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने कहा कि जिस प्रकार रथ को सही दिशा में चलाने के लिए घोड़ों पर नियंत्रण आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन में इंद्रियों और मन को नियंत्रित करना भी जरूरी है। यदि मन की लगाम परमात्मा के हाथों में सौंप दी जाए, तो व्यक्ति सही मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इसके लिए मन को निरंतर परमात्मा के चिंतन में लगाना आवश्यक है। स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज ने समझाया कि युद्ध के मैदान में सारथी लगाम के माध्यम से घोड़ों को नियंत्रित करता है और आवश्यकता पड़ने पर चाबुक का उपयोग करता है। इसी प्रकार मनुष्य को अपनी बुद्धि के माध्यम से इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। अनियंत्रित इंद्रियां व्यक्ति को भटकाव की ओर ले जा सकती हैं, जबकि संयमित मन और विवेकपूर्ण बुद्धि जीवन को अनुशासित बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि परमात्मा और भक्त का संबंध भी चुंबक और लोहे के समान है। जिस प्रकार चुंबक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है, उसी प्रकार भगवान अपने भक्तों को अपनी ओर खींचते हैं। सच्ची श्रद्धा, भक्ति और निरंतर स्मरण से व्यक्ति परमात्मा के निकट पहुंच सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण के नाम स्मरण का बताया महत्व
स्वामी जी ने भगवान श्रीकृष्ण के नाम की आध्यात्मिक महिमा समझाते हुए निरंतर नाम जप और भक्ति पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और परम आनंद की प्राप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण महत्वपूर्ण है। भगवान श्रीकृष्ण के नाम का निरंतर जप करने से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति का ध्यान सांसारिक भटकाव से हटकर आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
स्वामी जी के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को मन पर नियंत्रण रखने, इंद्रियों को संयमित करने और भगवान के प्रति समर्पण भाव अपनाने की प्रेरणा दी। गीता के संदेश के माध्यम से उन्होंने जीवन में भक्ति, विवेक और आत्मचिंतन के महत्व को रेखांकित किया।
