
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली बातचीत का फोकस केवल कूटनीतिक और वैश्विक मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंध और खास तौर पर भारत की विनिर्माण क्षमता भी अहम मुद्दा बनी हुई है। भारत और रूस के बीच व्यापार में बड़ा असंतुलन बना हुआ है। वर्ष 2024-25 में रूस को भारत का निर्यात 5 अरब डॉलर से भी कम रहा, जबकि रूस से भारत का आयात करीब 63.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस वजह से भारत का व्यापार घाटा लगभग 59 अरब डॉलर रहा। इसमें रूस से बड़े पैमाने पर होने वाला तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का आयात प्रमुख कारण है।
रूस को निर्यात बढ़ाने की चुनौती
रूस भारत के लिए तैयार माल और विनिर्मित उत्पादों का बड़ा संभावित बाजार है। लेकिन भारत अभी रूस की जरूरत के मुताबिक बड़े पैमाने पर प्रतिस्पर्धी उत्पाद उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है। इसके मुकाबले चीन की स्थिति काफी मजबूत है। चीन ने वर्ष 2025 में रूस को करीब 103 अरब डॉलर के सामान का निर्यात किया। इसमें कारों, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक उपकरणों सहित कई तरह के विनिर्मित उत्पाद शामिल हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि केवल कूटनीतिक बातचीत के जरिए रूस को भारतीय सामान खरीदने के लिए राजी करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए भारत को ऐसे उत्पाद और उत्पादन क्षमता विकसित करनी होगी जो कीमत, गुणवत्ता और पैमाने के मामले में अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
चीन के साथ व्यापार में बढ़ता घाटा
चीन के साथ भारत की आर्थिक तस्वीर अलग है। वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 151 अरब डॉलर रहा, लेकिन भारत का व्यापार घाटा लगभग 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया। रूस जहां मुख्य रूप से भारत को तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधन बेचता है, वहीं चीन भारत को बड़ी मात्रा में तैयार उत्पादों के साथ-साथ ऐसे मध्यवर्ती और पूंजीगत सामान भी उपलब्ध कराता है जिनकी भारतीय विनिर्माण कंपनियों को खुद जरूरत पड़ती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, ऑटो पार्ट्स और फार्मास्युटिकल इनपुट सहित कई क्षेत्रों में भारतीय उद्योग चीन से आने वाले सामान पर निर्भर है।
चीन पर निर्भरता कम करना आसान नहीं
भारत की नीति चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की रही है। लेकिन दूसरी ओर भारतीय उद्योग को चीन से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते और बड़े पैमाने पर उपलब्ध विनिर्मित सामान की जरूरत भी है। यही स्थिति भारत के सामने एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है। एक तरफ आर्थिक सुरक्षा के लिए चीन पर निर्भरता कम करने की जरूरत महसूस होती है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू उद्योग के लिए चीन की उत्पादन क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंच महत्वपूर्ण बनी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की संभावित बातचीत में व्यापार, निवेश और चीन से जुड़े कारोबारी प्रतिबंधों पर चर्चा होने की संभावना है।
असली चुनौती कूटनीति नहीं, औद्योगिक क्षमता
रूस और चीन के मामलों को एक साथ देखें तो भारत के सामने एक साझा चुनौती दिखाई देती है—देश की सीमित विनिर्माण क्षमता। रूस के मामले में समस्या यह है कि भारत बड़े बाजार में पर्याप्त मात्रा में अपने उत्पाद नहीं बेच पा रहा है। वहीं चीन के मामले में भारत को एक बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था से भारी मात्रा में आयात करना पड़ रहा है, जबकि भारत खुद अपनी औद्योगिक क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इससे सवाल उठता है कि क्या कूटनीति भारत की कमजोर विनिर्माण क्षमता की भरपाई कर सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका जवाब आसान नहीं है। विदेश नीति भारतीय कंपनियों के लिए बाजार और निवेश के अवसर खोल सकती है, लेकिन उन अवसरों को हासिल करने के लिए देश के पास प्रतिस्पर्धी उत्पाद और मजबूत उत्पादन क्षमता होना जरूरी है।
निवेश आकर्षित करने के लिए घरेलू सुधार जरूरी
भारत रूस और चीन दोनों को भारत से अधिक सामान खरीदने और देश में निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। लेकिन विदेशी निवेश आकर्षित करने का सबसे प्रभावी तरीका भारत को निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाना होगा। इसके लिए आर्थिक सुधारों को लगातार आगे बढ़ाने, नियमों को सरल बनाने, कारोबार की लागत घटाने, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के साथ घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करना जरूरी होगा। भारत को एक ऐसा मजबूत विनिर्माण इकोसिस्टम तैयार करना होगा, जिसमें वैश्विक कंपनियां निवेश करने के साथ-साथ देश में उत्पादन बढ़ाने को भी प्राथमिकता दें।
ब्रिक्स के बीच द्विपक्षीय बातचीत पर नजर
दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान बहुपक्षीय मुद्दों के साथ भारत के लिए रूस और चीन के साथ द्विपक्षीय आर्थिक बातचीत भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। भारत की विदेश नीति के जरिए रूस और चीन से अधिक व्यापार और निवेश हासिल करने की कोशिश जारी रह सकती है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपनी घरेलू औद्योगिक और विनिर्माण क्षमता को कितना मजबूत कर पाता है।
निष्कर्ष: भारत की आर्थिक कूटनीति की वास्तविक सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि दूसरे देश भारत से क्या खरीदने या यहां कितना निवेश करने के लिए तैयार होते हैं, बल्कि इससे भी होगी कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था में उत्पादन, प्रतिस्पर्धा और विनिर्माण क्षमता को कितनी तेजी से बढ़ा पाता है।
