
चित्तौड़गढ़ में 21 साल के आर्टिस्ट सुरेश जांगिड़ चूड़ियों और तार को कैनवास पर चिपका कर शैडो आर्ट बनाते हैं। ये आर्ट दिखने में बेहद अजीब लगती है लेकिन, लाइट पड़ते ही असली आर्ट उभर कर सामने आती है।
सुरेश ने 10 साल से अपने दादा से मूर्ति बनाना सीखा था। उनके दादाजी पत्थर की मूर्तियां बनाते हैं। सुरेश ने पारंपरिक आर्ट से अलग हटकर सोचा और शैडो और थ्रेड आर्ट बनाने की शुरुआत की।
उन्होंने प्लास्टिक बोतल और पेन के यूज से राम मंदिर बना दिया। वहीं गत्ते को अलग-अलग जोड़ कर हनुमान जी बना दिए।
पहले देखिए शैडो आर्ट…
तस्वीर, राम मंदिर की है। इसे सुरेश ने प्लास्टिक और वेस्ट मटेरियल से शैडो आर्ट के रूप में तैयार किया है।
बजरंग बली को सुरेश ने गत्ते की सहायता से बनाया है।
तेल की बोतल, पेन से श्रीराम
सुरेश कहते हैं- शैडो आर्ट एक ऐसी कला है जिसमें असली तस्वीर सीधे नजर नहीं आती, बल्कि लाइट सामने पड़ने पर ये उभर कर सामने आती है।
सुरेश ने कहा- 2 तरह ही शैडो आर्ट हैं। एक पुराने सामान से थर्माकोल पर तेल की खाली बोतलें, प्लास्टिक के टुकड़े, पेन और कोल्ड ड्रिंक की बोतलों के ढक्कन से एक मॉडल तैयार जाता है। जिस पर लाइट आते ही दीवार पर असली तस्वीर बनकर उभरती है।

इसी मॉडल को दीवार पर शैडो की तरह देखा जा सकता है।
गत्ते से हनुमानजी
दूसरे में चूड़ियां,गत्ते और कागज का इस्तेमाल करके एक मॉडल तैयार किया जाता है। इसके बाद इस मॉडल को अंधेरे में रखकर उस कागज पर लाइट करने से आर्ट उभरती है। इस पूरी प्रक्रिया में हर सामान की जगह और लाइट का एंगल बहुत जरूरी होता है।
अब 2 पॉइंट्स में समझिए पूरा प्रोसेस…
1. पहले दीवार पर बनती है आकृति: सुरेश बताते हैं- शैडो आर्ट बनाने के लिए सबसे पहले उन्होंने दीवार पर उस आकृति को बनाया। इसके बाद थर्माकोल पर आकृति के हिसाब से चीजों को सेट करना शुरू किया। जैसे पेन को ऐसे सेट किया वह दीवार पर शैडो में झंडे का डंडा लगे। चूड़ियों को धनुष बाण की तरह सेट किया। इसके बाद अलग-अलग ऑब्जेक्ट (बोतल, वेस्ट मटीरिल) को एक-एक करके फिक्स करना शुरू किया।
2. एक-एक कर लगाते हैं ऑब्जेक्ट्स: सामने एक लाइट को भी तय जगह पर रखा गया और उसे ऑन किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे ऑब्जेक्ट्स को इस तरह जोड़ा गया कि उनकी परछाई दीवार पर सही जगह पर पड़े। इस दौरान वे लगातार दीवार पर बनने वाली छाया को देखते रहे और जरूरत के हिसाब से ऑब्जेक्ट्स की पोजिशन बदलते रहे।
इस पूरी प्रक्रिया में काफी धैर्य और ध्यान की जरूरत होती है। इस आर्ट को बनाने में उन्हें करीब 24 घंटे का समय लगा।

ये है 3D आर्ट इसमें महाराणा प्रताप तस्वीर से बाहर दिखाई देते हैं।
थ्रेड आर्ट में बिना स्केच के बनती है आकृति
सुरेश बताते हैं- थ्रेड आर्ट में धागों की मदद से तस्वीर बनाई जाती है, लेकिन इसकी खास बात यह है कि इसमें पहले से कोई चित्र नहीं बनाया जाता। सबसे पहले एक बोर्ड पर अंदाज से छोटी-छोटी कील लगाते हैं। इसके बाद उन कीलों को नंबर देते हैं और फिर उसी नंबर के अनुसार धागे को जोड़ते जाते हैं।
धीरे-धीरे धागों का यह जाल एक पूरी आकृति का रूप ले लेता है। उन्होंने इसी तकनीक से भगत सिंह और एक मोर की तस्वीर बनाई है। यह कला पूरी तरह से अनुमान और अनुभव पर आधारित होती है, जिसमें हर स्टेप पर सटीकता जरूरी होती है।
सोशल मीडिया से आया आईडिया
सुरेश जांगिड़ का कहना है कि उन्होंने इस तरह की कला की शुरुआत सोशल मीडिया से देखकर की। अलग-अलग वीडियो और पोस्ट देखने के बाद उनके मन में कुछ नया करने की इच्छा जगी। इसके बाद उन्होंने खुद से ही शैडो आर्ट और थ्रेड आर्ट बनाने की कोशिश शुरू की।
उन्होंने छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट किए और धीरे-धीरे इसमें सुधार करते गए। उनका कहना है कि शुरुआत में ही उन्हें अच्छे परिणाम मिलने लगे, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा।

ये धागों (थ्रेड आर्ट) की मदद से बनाई जा रही आर्ट है।
परिवार से मिली कला की विरासत
सुरेश जांगिड़ का कहना है कि उन्होंने बचपन से ही अपने दादाजी लक्ष्मी चंद सुथार से मूर्ति बनाने की कला सीखी है। उनके दादाजी पत्थर से मूर्तियां बनाते हैं, जबकि उनके पिता नारायण लाल पत्थर से किचन और सीढ़ियां बनाने का काम करते हैं। ऐसे माहौल में सुरेश का कला की ओर झुकाव स्वाभाविक था।

थ्रेड आर्ट के जरिए तैयार हुआ मोर, ये धागों को कीलों से जोड़कर बनाया गया है।
पढ़ाई के साथ कला में लगातार कोशिश
सुरेश वर्तमान में एमएससी संस्कृत के पहले सेमेस्टर के स्टूडेंट हैं और पढ़ाई के साथ-साथ अपनी कला को भी समय दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 2 साल से वे शैडो आर्ट और थ्रेड आर्ट पर काम कर रहे हैं।
इसके अलावा वे 3D पेंटिंग, क्राफ्ट और पत्थर की मूर्तियां भी बनाते हैं।
परिवार का मिला पूरा सहयोग
सुरेश के परिवार में दादाजी लक्ष्मी चंद सुथार (75), दादी प्रेम बाई (70), पिता नारायण लाल (45), माता निर्मला देवी (42) और बड़ी बहन शीला सुथार (24) हैं। परिवार का उन्हें पूरा सहयोग मिलता है, जिससे वे अपने काम पर ध्यान दे पाते हैं।
