
श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] मैं बड़ा हूँ। ढिमकाना और बड़ा है। ये सिद्ध है। वो सिद्ध पुरुष है। ये सिद्ध स्थान है। ये सिद्ध मकान है। वो बड़ा ग्रुप है। वो बड़ा नेता है….इस प्रकार के बड़ों की बड़ाई होती रहती है। स्वयंभू बड़ों/सिद्धों के प्रचार के लिये बाकायदा प्रेस नोट जारी होते हैं। जनता को आमंत्रित किया जाता है कि आइये! हम बड़े हैं! पधारिये हम सिद्ध हैं! दर्शन कीजिये, हम सिद्ध पुरुष हैं…सिद्ध स्थान हैं।
अरे भाई, कोई सिद्ध है तो उसे खुद को बताने की जरूरत ही क्या है! जो सिद्ध है, जो बड़ा है, उसकी ख्याति स्वयं इत्र की महक की भांति यत्र-तत्र-सर्वत्र स्वतः ही पहुँच जाएगी। इत्र अपनी भीनी भीनी महक के माध्यम से ही तो अपनी उपस्थिति साबित करता है।
बरगद कभी स्वयं किसी को नहीं कहता है कि वो बरगद है। ना बरगद कोई प्रेस नोट जारी करता है और ना ही उसकी ओर से कोई कर्मचारी/अधिकारी तैनात किए गये हैं, जो सभी को ये बताने का हुकुम बजाते हों कि वो बरगद है। आइये, देखिये।
इसके बावजूद दूर से पता लग जाता है कि उधर कोई बरगद है। बरगद का कद, धरती के भीतर गहरे तक पकड़ बनाए उसकी जड़ें और घनी छाया खामोशी से बता देती है कि यही बरगद है। अब तक यही सुना है कि बरगद ही है जिसकी जड़ें बहुत बहुत नीचे तक होती है।
गजसिंहपुर और एक बॉर्डर पर स्थिति गाँव मेँ बरगद का पेड़। बेशक उन्हें देखे कई दशक हुये, परंतु कभी कभी उनकी स्मृति ये अनुभूति करवा देती है कि बरगद होता क्या है! बड़े व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की मौजूदगी का अहसास खुद ब खुद हो जाता है। क्योंकि उनका बोलना, उठाना-बैठना, मिलना, चलना सब कुछ बेहद विनम्र और अपनत्व से भरा होता है।
सभी उनसे मिलने को लालायित रहते हैं। उनसे मिल कर स्वयं को बेहतर बनाते हैं। अगर बड़े व्यक्ति की मौजूदगी, गैर मौजूदगी का अहसास ही ना हो तो फिर वो काहे का बड़ा! बड़ा तो वो भी होता है, जो दही मेँ पड़ा होता है।
बड़े बड़े कॉर्पोरेट घराने पीआर एजेंसी की सेवाएँ लेते हैं। एजेंसी के अधिकारी कर्मचारी उस घराने के लिये शासन-प्रशासन से लेकर क्षेत्र के जाने माने व्यक्तियों के साथ लाइजिंग रखते हैं। उनसे लगातार संवाद करते हैं। उनके लिये समय समय पर विभिन्न प्रकार के आयोजन करते हैं।
घराने के कद के अनुरूप/मालिक के प्रोटोकल के अनुसार शासन-प्रशासन मेँ पदों पर बैठे व्यक्तियों को आमंत्रित करते हैं। विचारशील, ओपिनियन मेकर, बेहतरीन और निष्पक्ष व्यक्तियों से संवाद करते हैं।
पीआर एजेंसी/विभाग का काम लाइजिंग रख ग्रुप/घराने के प्रति जिज्ञासा पैदा करना होता है। रुतबा बनाना होता है। ताकि कहीं भी किसी प्रकार का काम हो तो तुरंत हो जाओ।
फील्ड मेँ, शासन-प्रशासन मेँ किसी कॉर्पोरेट घराने/ग्रुप के दूत के रूप मेँ काम करने वाली पीआर एजेंसी/विभाग को अगर संबन्धित ग्रुप की मर्यादा, प्रतिष्ठा और मालिक के कद का अंदाजा नहीं है तो फिर वो एजेंसी उस घराने/ग्रुप की प्रतिष्ठा बढ़ाने के बजाये अंजाने मेँ घटा देती है।
ग्रुप की शीर्ष मैनेजमेंट को पता ही नहीं लगता कि उनकी घेरा बंदी कर ली गई है। घेरा बंदी होने के बाद तो फिर ग्रुप/घराने के शीर्ष उन्हीं से मिलते हैं, जिनसे मिलवाया जाता है। जय जय कार सुनने की आदत पड़ जाये तो फिर राह दिखाने वाले दुश्मन की भांति लगते हैं। और फिर….जय राम जी की! फिर जितनी जल्दी आए, उतनी जल्दी विदाई…जैसे श्रीमान बी डी अग्रवाल जी एंड कंपनी। [समाप्त]
