
नई दिल्ली। अपने सख्त प्रशासनिक अंदाज और जनता से सीधे जुड़ने की कार्यशैली के लिए चर्चा में रहने वाले IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे ने ब्यूरोक्रेसी को लेकर अपनी सोच खुलकर सामने रखी है। उन्होंने कहा कि किसी अधिकारी की पहचान उसके पद या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता से होनी चाहिए। मुंढे ने कहा कि वह खुद को सिर्फ ‘बाबू’ या ‘ब्यूरोक्रेट’ कहलाने के बजाय पब्लिक सर्वेंट मानते हैं। उनके मुताबिक आने वाले भारत के लिए ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें जनहित, पारदर्शिता, जवाबदेही, सेवा भावना और नवाचार को सबसे ज्यादा महत्व मिले।
‘ब्यूरोक्रेसी की पुरानी छवि बदलनी होगी’
मुंढे के मुताबिक समस्या ‘ब्यूरोक्रेट’ शब्द में नहीं है, बल्कि उस छवि में है जिसमें सरकारी तंत्र को अक्सर धीमा, बदलाव से दूर और आम लोगों से कटे हुए सिस्टम के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि इस धारणा को बदलना किसी एक अधिकारी की जिम्मेदारी नहीं है। पूरी सिविल सर्विस को यह समझना होगा कि उसका मूल उद्देश्य जनता की सेवा करना और संवैधानिक मूल्यों के मुताबिक काम करना है।
कागज पर नहीं, जमीन पर दिखे नीति का असर
तुकाराम मुंढे ने कहा कि किसी सरकारी नीति की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसे कितनी अच्छी तरह तैयार किया गया है। असली सवाल यह है कि उस नीति से आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया। उनके अनुसार अधिकारी की भूमिका सिर्फ सरकार के आदेशों को लागू करने तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ स्तर पर अधिकारी नीति बनाने में योगदान देते हैं और फील्ड में उन्हीं नीतियों को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी निभाते हैं।
‘अगर मैं नहीं, तो और कौन?’
मुंढे ने प्रशासन और समाज में बदलाव को लेकर एक अहम सवाल भी रखा—अगर मैं नहीं, तो और कौन?उनका कहना है कि किसी एक अधिकारी या व्यक्ति से उम्मीद टूटना और पूरी संस्था से उम्मीद खत्म कर देना दो अलग बातें हैं। संसद, न्यायपालिका, प्रेस, विधायिका और सिविल सर्विस जैसी संस्थाएं लोकतंत्र की बुनियाद हैं। इन्हें समय के साथ बदलती जरूरतों के मुताबिक खुद को बेहतर करते रहना चाहिए।
जनता से सीधे मिलते हैं, रोज सुनते हैं समस्याएं
मुंढे ने बताया कि वह रोज शाम 4 से 5 बजे तक आम लोगों से सीधे मिलते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं। उनके मुताबिक जनता से सीधा संवाद प्रशासन के लिए सबसे प्रभावी फीडबैक में से एक है। उन्होंने कहा कि अधिकारी मीडिया, जनप्रतिनिधियों और दूसरे माध्यमों से भी जानकारी हासिल कर सकते हैं, लेकिन जब वह खुद लोगों से मिलकर उनकी परेशानी सुनता है तो उसे समस्या की जमीनी तस्वीर ज्यादा स्पष्ट रूप से समझ आती है।
‘ब्यूरोक्रेसी से उम्मीद मत छोड़िए’
मुंढे ने लोगों से प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर पूरी तरह निराश न होने की अपील की। उनका कहना है कि सिस्टम में कमियां हो सकती हैं और कई बार लोगों को सरकारी तंत्र के कामकाज से निराशा भी होती है, लेकिन ईमानदारी से काम करने वाला एक अधिकारी बदलाव की मिसाल कायम कर सकता है। उन्होंने अपने अलग-अलग प्रशासनिक अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि IAS की खासियत यह है कि अधिकारी को अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने और देश की सेवा के कई तरीके सीखने का मौका मिलता है।
1991 के आर्थिक सुधारों का भी दिया उदाहरण
भारत में बड़े संस्थागत बदलावों की चर्चा करते हुए मुंढे ने 1991 के आर्थिक सुधारों का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक बड़े बदलावों में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका अहम होती है, जबकि प्रशासनिक तंत्र उस विजन को जमीन पर लागू करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।उनका जोर इस बात पर था कि चर्चा केवल किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को बेहतर बनाने की होनी चाहिए।
संस्थाएं मजबूत होंगी तो व्यवस्था मजबूत होगी
तुकाराम मुंढे की पूरी बात का केंद्र यही रहा कि लंबे समय तक बदलाव किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं टिक सकता। इसके लिए संस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है।उनके मुताबिक एक पब्लिक सर्वेंट का काम सिर्फ आदेश जारी करना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि फैसलों का असर वास्तविक लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं। जनता से जुड़ाव, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों पर भरोसा ही बेहतर प्रशासन की नींव बन सकता है।
खास बात: तुकाराम मुंढे की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वह महाराष्ट्र FDA में खाद्य सुरक्षा को लेकर सख्त कार्रवाई के कारण भी लगातार चर्चा में हैं।
