भागवत गीता प्रवचन के सातवें दिन बोले महाराज, गीता भगवान श्रीकृष्ण का महाप्रसाद, नियमित अध्ययन से मिलती है भय और शोक से मुक्ति

हनुमानगढ़। श्री कल्याण कमल आश्रम, हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी श्री कमलानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का सार है। अन्य शास्त्रों में जहां विषयों का विस्तार मिलता है, वहीं गीता में ज्ञान का सार समाहित है। आज के समय में हर व्यक्ति कम समय में अधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। ऐसे में गीता का अध्ययन मनुष्य को जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है। स्वामी कमलानंद गिरि जी महाराज भागवत गीता प्रवचन कार्यक्रम के सातवें दिन श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गीता में सार ही सार भरा हुआ है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को गीता का नियमित अध्ययन करना चाहिए और इसके उपदेशों को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता महाप्रसाद
महाराज जी ने गीता की महिमा बताते हुए कहा कि घरों में विराजमान लड्डू गोपाल और शालिग्राम जी को भोग अर्पित करने के बाद भक्त उस भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। भगवान का स्पर्श पाकर भोग प्रसाद बन जाता है, लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली दिव्य वाणी है। इस दृष्टि से गीता भगवान का महाप्रसाद है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जिस प्रकार भक्त श्रद्धा के साथ भगवान का प्रसाद ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार गीता के ज्ञान को भी श्रद्धापूर्वक सुनना, पढ़ना और आत्मसात करना चाहिए। गीता का संदेश मनुष्य को सही मार्ग पर चलने, अपने कर्तव्यों को समझने और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।
गीता का अध्ययन आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग
स्वामी कमलानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि गीता का अध्ययन मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ले जाता है। बैकुंठ की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि यह ऐसा आध्यात्मिक अवस्था और धाम है, जहां भय, शोक और बंधनों से मुक्ति का भाव है तथा जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है। महाराज जी ने नियमित गीता अध्ययन और प्राणायाम के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना से मनुष्य अपने जीवन को अनुशासित बना सकता है तथा मन में व्याप्त विकारों से मुक्ति पाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। गीता के ज्ञान और नियमित साधना के माध्यम से व्यक्ति को आत्मचिंतन, संयम और भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए। प्रवचन के दौरान महाराज जी ने श्रद्धालुओं को गीता के उपदेशों को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उन्हें अपने व्यवहार और दैनिक जीवन में उतारने का संदेश दिया।
