
श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] बाइक चालक का हेलमेट और विवाह योग्य लड़के का खूबसूरत पैकेज दोनों की जाने कितनी कमियों को छिपा छिपा लेते हैं। संभव है आपको मेरी ये बात मज़ाक लगे, किन्तु आज के वातावरण मेँ ये शब्द शत प्रतिशत सच है। विश्वास नहीं तो सड़कों पर देख लो। कोई भी पुलिसवाला हेलमेट लगाये बाइक चालक को नहीं रोकेगा, चाहे वो बाइक चोरी ही क्यों ना हो। बेशक उस बाइक मेँ कोई नाजायज सामाग्री, हथियार ही क्यों ना हों? । बिना हेलमेट वाला प्रत्येक बाइक चालक पुलिस वालों की नजरों मेँ खटकता है, चाहे वो शहर का कितना भी अमन पसंद, शरीफ और जागरूक नागरिक क्यों ना हो।
अब जिक्र पैकेज का। विवाह योग्य लड़के का पैकेज आकर्षक है तो लड़की वाले बहुत कुछ नजर अंदाज करने की सोच लेते हैं। लड़के का पैकेज हैंडसम है तो फिर ना तो परिवार की पृष्ठभूमि पर निगाह मारने का मन करता है और ना लड़के के चरित्र के बारे मेँ अधिक छान-बीन करने की कोशिश होती है।
ये सब इसलिए की वर्तमान मेँ जो परिवार अपनी लड़की के लिये नौकरी वाला लड़का तलाश कर रहे हैं, उनके लिये हैंडसम पैकेज पहली शर्त होती है। हाँ, लड़का सरकारी जॉब मेँ है तो पैकेज के संदर्भ मेँ अधिक पूछ ताछ नहीं होती। कम पैकेज वाले चरित्रवान लड़के, लड़के का संस्कारी और सरल स्वभाव का परिवार उनके किसी काम का नहीं होता, ना निभे। शादी के बाद हैंडसम पैकेज वाले का परिवार लड़की को तंग परेशान करे, कोई परवाह नहीं। बस, मोटा पैकेज पहली शर्त है। विवाह टूटा तो पाइकह मोटा मिलेगा।
जिनकी सोच केवल हैंडसम पैकेज है, क्या उनके परिवार की सभी लड़कियों के विवाह इसी आधार पर हुये हैं? क्या लड़की वाले पैकेज की तलाश करते समय ये देखते हैं कि उनके पास लड़के वालों की तुलना मेँ क्या है? कितनी आमदनी है! कैसा मकान है! शायद नहीं! क्योंकि समाज की चाल ही ऐसी हो गई कि सबसे पहले पैकेज पूछा जाता है; संस्कार, सरलता, शराफत सब इसके सामने बोने हो जाते हैं, नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। हमारे परिवार की बहिन बेटियों के रिश्ते बिना पैकेज देखे किये; आज सभी अपने-अपने ससुराल मेँ मौज कर रहीं हैं।
ख़ाकसार ये नहीं कह रहा कि लड़की वाले पैकेज ना देखें, देखें! परंतु केवल हैंडसम पैकेज ही लड़के से रिश्ते का एक मात्र कारण होना तो किसी मेरी व्यक्तिगद्त दृष्टि मेँ उचित नहीं है। पैकेज के साथ लड़के और लड़के के परिवार की पृष्ठभूमि भी तो हैंडसम होनी चाहिये। पैकेज के बारे मेँ तो अर्द्ध सत्य भी बोला सुना जा सकता है, किन्तु परिवार की पृष्ठभूमि का सच तो आम तौर पर सभी को मालूम ही होता है।
असल मेँ लड़की के लिये सुकून, शांति और आनंददायी वातावरण तलाश करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। परंतु आर्थिक युग और दिखावे के इस दौर ने सुकून, शांति, आनंद जैसी प्राथमिकता को पीछे छोड़ दिया है, नजर अंदाज कर दिया है।
मान लो पैकेज तो बहुत बड़ा है, परंतु पैकेज वाले दामाद के पास अपनी पत्नी अर्थात लड़की के लिये वक्त ही नहीं तो फिर उस पैकेज का क्या अर्थ!
पैकेज बड़ा है और लड़के वालों की डिमांड भी उस पैकेज के अनुरूप हुई तो फिर भविष्य मेँ लड़की को ससुराल मेँ दिक्कत होना स्वाभाविक है। लेकिन कोई किसी को समझाये भी तो कैसे। रिवाज बन गया, हाय पैकेज! दिखावा हो गया, हाय पैकेज! ईश्वर जाने ये अंधी दौड़ और होड़ कहाँ जाकर समाप्त होगी। [समाप्त]
