
श्रीगंगानगर। [गोविंद गोयल] इन शब्दों के साथ जो फोटो है, वो 2020 की है। कलक्ट्रेट के बाहर पत्रकारों ने समूहिक रूप से खिचवाई थी। आम तौर पर पत्रकार इस प्रकार की फोटो नहीं खिचवाते, लेकिन ये फोटो विशेष रूप से खिचवाई गई। कलक्ट्रेट मेँ तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री गोविंद डोटासरा की प्रेस वार्ता थी। पत्रकार सभाकक्ष मेँ पहुँच गए। मंत्री जी कलक्ट्रेट मेँ ही थी। परंतु लगभग एक घंटे के इंतजार के बावजूद मंत्री महोदया प्रेस वार्ता मेँ नहीं आए। यहाँ तक कि सरकारी पक्ष ने सूचना भी नहीं दी की वो कब तक आएंगे।

आखिर पत्रकारों का धैर्य जवाब दे गया। अपवाद को छोडकर पत्रकार कलक्ट्रेट से निकले और सामने सड़क के उस पार खड़े हो गए। सभी ने शपथ ली कि वो अब प्रशासन/मंत्री जी के बुलावे पर भी नहीं जाएंगे। सोशल मीडिया पर तुरंत बहिष्कार की सूचना वायरल हुई। प्रशासन जिनको मना कर ले जा सकता था ले गया, बाकी नहीं गए। आज इस प्रकार के बहिष्कार की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। वो भी सत्तारूढ पार्टी के नेता की।
कई साल पहले सर्किट हाउस मेँ कांग्रेस की प्रेस वार्ता। ख़ाकसार निर्धारित समय पर पहुंचा तो देखा कि सर्किट हाउस का मीटिंग हॉल कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से भरा हुआ है। ऐसी भीड़ मेँ प्रेस वार्ता तो संभव नहीं। ख़ाकसार तो कुछ क्षण खड़ा रहा और फिर बाहर गया। साथी आए…मुझसे पूछा। मैंने बताया कि भीतर प्रेस वार्ता का माहौल ही नहीं है। क्योंकि भीड़ मेँ प्रश्न हो नहीं सकते। आप सब भीतर का दृश्य देख लो, फिर निर्णय कर लेते हैं। उसके बाद सभी पत्रकार सर्किट हाउस से तीन पुली पहुँच गए।
पत्रकार ही नहीं तो फिर प्रेस वार्ता होती भी कैसे! कांग्रेस नेता तीन पुली पहुंचे। पत्रकारों से चर्चा की। पत्रकारों ने कहा कि जिसने प्रेस को संबोधित करना है, उन नेताओं के अतिरिक्त मौके पर वो नेता कार्यकर्ता हों जिनके जिम्मे उचित व्यवस्था करना है। वही हुआ। प्रेस वार्ता सर्किट हाउस की बजाए होटल मेँ हुई और उसमें भीड़ नहीं थी। अब ऐसा संभव नहीं। क्योंकि पत्रकारों की संख्या बढ़ चुकी है। और कुछ पत्रकार प्रेस वार्ता से चले भी गए तो कुछ वहीं रह भी जाएंगे। सभी पत्रकार चले जाएँ तो उनके खुद के बंदे तो रहेंगे जो उन्हें लाइव रखते हैं।
बेशक प्रेस वार्ता का सामूहिक बहिष्कार साधारण बात पर नहीं होता। परंतु वर्तमान दौर मेँ तो असाधारण बात पर भी बहिष्कार बहुत मुश्किल है। क्योंकि आज के दिन पत्रकारों मेँ एकता नहीं है। एकता के अभाव मेँ ना तो पत्रकारों की सुरक्षा पर चर्चा हो पाती है और ना ही उनकी समस्या और अधिकारों पर। इसी कारण से प्रशासन और प्रेस के बीच पहले जैसा तालमेल भी नहीं है। किसी पत्रकार का व्यक्तिगत तालमेल हो तो हो।
संवादहीनता की स्थिति के चलते पत्रकारों के पास वही आता है जो प्रशासन की ओर से बताया जाता है। इस अवस्था मेँ अपवाद को छोडकर सूत्र भी पीछे हट जाते हैं। सूत्र कुछ बताएँगे भी तो वही जो उनके या उनके ग्रुप के स्वार्थ की पूर्ति करने मेँ सहायक होगा। प्रशासन के साथ ही क्यों, सभी क्षेत्रों मेँ ऐसी ही स्थिति है। राजनीतिक गलियारों का भी नियमित संवाद अब प्रेस से नहीं होता। क्योंकि उनके पास भी अपना स्वयं का प्रचारक है। जो कभी सवाल भी नहीं करता। इन सभी विषयों पर चिंतन की जरूरत है। ताकि पत्रकार कौन है? पत्रकार किसे कहें? इसकी कोई सर्व सम्मत परिभाषा बन सके। [समाप्त]
