
श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] “क्या पत्रकारिता डरा कर करनी चाहिए” इस शीर्षक से कल पोस्ट किए आलेख के संदर्भ मेँ एक रिटायर्ड प्रो ने मुझे मेसेज भेजकर कहा, गोविंद जी! आपने नाग वाली कहानी तो सुनी होगी। काटना किसी को नहीं, बस फुफकारना है। प्रो. जी की बात मेँ दम है। लेकिन एक शंका भी कि अगर केवल फुफकारना ही रहा तो फिर सभी ये कहेंगे, भौंकता ही है, काटता नहीं। संस्कारी व्यक्ति हुआ तो ये कह सकता है कि गरजने वाले बादल बरसते नहीं। खैर बात वही कि जाने किसने मेरे भीतर इस प्रकार के संस्कार, व्यवहार भर दिये कि आज पत्रकार के रूप मेँ खुद को अनेक दुविधाओं के बीच खड़ा महसूस कर रहा हूँ।
असल बात ये कि कई दिन पहले फोन आया…फोन करने वाले ने बड़े प्रेम से संवाद किया और कहा, गोविंद जी! रीच तो हमारे पेज की आपके पेज बहुत अधिक है, लेकिन चर्चा आपकी होती है। बड़े बड़े व्यक्तित्व इंटरव्यू देने गो गो लाइव शो मेँ आते हैं। मेरे पास उनका आभार व्यक्त करने के अतिरिक्त कोई विकल्प था ही नहीं। मैंने बस यही कहा कि किसी दिन आप मुझे अपने यहाँ आमंत्रित करो। सवाल जवाब का सत्र करो। आप मुझसे सवाल करना, गोविंद उसके जवाब देगा। संभव है आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाए।
सोशल मीडिया पर पत्रकार से मारपीट होने की सूचना वायरल होती रही। किन्तु ना तो किसी पत्रकार ने इस बाबत कुछ बताया ना ही कहीं कोई चर्चा। मैंने पोस्ट डालने वाले जागरूक नागरिक से पूछा कि किस पत्रकार के साथ घटना हुई है? उनका कहना था, मुझे तो अधिक नहीं मालूम। मेरे पास उनका ही मेसेज आया था, मैंने पोस्ट कर दिया। जागरूक नागरिक ने एक नाम बताया और कहा कि उन्हें पता है, वो मौके पर थे। मैंने उस व्यक्ति से बात की। तब कहीं जा कर पता लगा कि क्या घटना हुई थी। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि उनकी रीच तो बहुत है, लेकिन मौके पर पत्रकार तो दिखे नहीं, उन्होंने हमारे संगठनों को ही बुलाया था।
बेशक गोविंद गोयल सभी पत्रकारों से परिचित हो और सभी पत्रकार गोविंद से परिचित हो, ये कोई जरूरी नहीं। किन्तु ये जरूर है कि पत्रकार से हुई घटना की जानकारी तो साथियों से मिल ही जाती है। उस पर चर्चा भी होती है। रिश्ते कैसे भी हों, उनसे बात करता हूँ। दूसरों से भी जानकारी लेकर आगे बढ़ते हैं। मेरे भीतर का पत्रकार मुझसे सवाल भी करता है कि ऐसा क्यों होता है? किन्तु इसका जवाब नहीं। कलक्टर-एसपी की प्रेस वार्ताओं से लेकर सरकारी मीटिंग्स तक मेँ अनेक चेहरे नजर आते हैं। परंतु नहीं पता होता कि ये चेहरे किस पत्रकारिता से जुड़े हैं। आयोजक ही नहीं पूछते तो ख़ाकसार क्या तकलीफ है, किसी के वहाँ होने मेँ। कोई राम राम करे तो राम राम कर लेते हैं, बस इतना ही।
पत्रकार के रूप मेँ दुविधा यही कि पत्रकार आखिर है कौन? मेरे भीतर के पत्रकार से मेरी लड़ाई यही कि तू पत्रकार है भी क्या? क्योंकि अपवाद को छोडकर मैं कभी किसी आलेख या खबर मेँ खुद को पत्रकार गोविंद गोयल नहीं लिखता। स्वयं का परिचय पत्रकार के रूप मेँ देने मेँ संकोच करता हूँ। विजिटिंग कार्ड और जरूरी पत्र व्यवहार मेँ ही नाम के साथ पत्रकार लिखता हूँ। सरकारी कार्ड मेँ भी ऐसा ही है।
दुविधा यही कि पत्रकार से मारपीट हुई और पत्रकारों मेँ चर्चा नहीं! पत्रकार कौन है इसकी सर्व सम्मत कोई परिभाषा नहीं। वो दौर अलग था जब किसी अखबार से जुड़े व्यक्ति को पत्रकार का दर्जा था। क्योंकि अखबार के शीर्षक सरकार की ओर रजिस्टर्ड होते थे। फिर टीवी न्यूज चैनल की घर घर अप्रोच हुई। उनके रिपोर्टर भी बाकायदा आई कार्ड और चैनल के माइक के साथ दिखते थे। अब तो वक्त ही बहुत आगे है। इसलिए सोशल मीडिया के इस दौर मेँ सभी पत्रकार है। अपने आपको इतना समझा कर अपनी ही दुविधा का निवारण करने की कोशिश है। [समाप्त]
