
श्रीगंगानगर। [गोविंद गोयल] बदलते वक्त मेँ रिश्ते सिकुड़ते जा रहे हैं। अब सगे भाई-बहिन के बच्चों के संग भी अपनत्व, आधिकारिक रिश्ते नहीं रह पाते जो पहले हुआ करते थे। वर्तमान मेँ रिश्ता बस खुद के बच्चों तक ही सिमट गया है। उसमें भी सीमा आ गई। पोते-पोतियों, दोहते-दोहतियों को भी पहले जैसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कह दिया तो आना छोड़ देंगे। संवाद करना बंद कर देंगे। दादा-दादी, नाना-नानी से दूर-दूर रहेंगे। हम दो, हमारे दो की सोच ने परिवार तो पहले ही सिकुड़ चुके थे, अब रिश्ते भी इसी राह पर चल दूर निकल गये हैं।
पार्क मेँ शाम को पत्नी के साथ सैर कर रहा था। हमसे आगे एक और दंपती थे। अचानक एक महिला तेजी से निकली, आगे जा रही महिला को ताई जी, नमस्कार कहा और उसी प्रकार तेज कदमों से आगे निकल गई। ख़ाकसार ने सुना, पुरुष अपनी पत्नी को कह रहा था, कमाल है, महिला के पास इतना वक्त भी नहीं कि ताई-ताऊ के संग बात करे; बात ना करे तो चाल तो धीरे कर, दो घड़ी साथ चले।
पत्नी बोली, छोड़ो ना, नमस्कार कर लिया यही काफी है। अब पहले वाला वक्त नहीं रहा। महिला को भी सैर करनी है। फिर घर जाना है। खाना बनाना है। और भी बहुत सारे काम होंगे। पार्क मेँ कई चक्कर निकाले। लेकिन उस युवती को उस दंपती से संवाद करते नहीं देखा। ना उसने चलने की गति धीमी की और ना दो कदम उनके साथ चली, जिन्हें युवती ने ताई संबोधित कर नमस्कार किया था।
कहते हैं कि दोस्तों के घर किसी भी वक्त, बिना किसी हिचक के जाया जा सकता था। अब ऐसा करना मुश्किल है। अब तो सगे भाई-बहिन के घर वक्त-बेवक्त जाने मेँ भी हिचकिचाहट होती है। ये सोचना पड़ता है कि कहीं सो ना रहे हों! भोजन का समय ना हो! बच्चों के साथ ना बैठे हों! तमाम प्रकार की तसल्ली के बाद ही भाई-बहिन के घर की दहलीज पर कदम रखे जाते हैं।
अब तो ना कोई अधिकार से आता है, ना कोई जाने की सोचता है। और ना जाने किस-किस स्थान पर वक्त बिताएँगे, परंतु परिवार के नाम पर अपने घर के अलावा कहीं नहीं जाएँगे। धर्म स्थल चले जाएंगे। मेला घूम आएंगे। सर्कस देखने मेँ चार घंटे लगा देंगे। पार्क मेँ यूं ही बैठ कर टाइम पास कर लेंगे। परंतु अपने घर के अतिरिक्त भाई, बहिन, चाचा, ताऊ, नाना, मामा, बुआ के घर जाने मेँ संकोच करेंगे। अब तो वार त्योहार, सुख-दुख मेँ ही जाना होता है। औपचारिकता के लिए जाना भी हुआ तो व्हाट्सएप को साथ लेकर जायेंगे।
वो भी जमाना था जब पड़ोसी तक बच्चों को डांट दिया करते थे। बच्चे की हिम्मत नहीं होती थी कि वो घर जाकर बताये। आज अपने और सगे भाई-बहिनों के बच्चों तक को कुछ कहने मेँ संकोच होता है। इस दौर मेँ भाई-बहिनों सहित किसी भी रिश्ते को ना तो कोई राय दे सकते हो और ना ये कह सकते हो कि अपने बच्चे की संभाल करो। किसी को राय देना; हक समझ कर टोका-टाकी करने का अर्थ होगा, रिश्ते खराब करना। जिसको टोका, वो फिर दूर ही रहेगा।
परिवार इस कदर सिकुड़ गये हैं कि सभी के सुख-दुख पूरी तरह से निजी हो गये। जो सुख परिवार को शामिल करने से बढ़ जाता था, दुख बंट जाता था, अब वो सब व्यक्तिगत हो चुका है। समाधान तो यही कि जो वक्त इधर-उधर, बेवजह व्यतीत करते हैं, वो किसी अपनों के बीच बिताया जाये। ताकि रिश्तों पर लगातार पड़ रही बर्फ कुछ तो पिघले। संभव है अभी बर्फ ने चट्टान का रूप ना लिया हो; इसलिए थोड़े प्रयास से ये पिघल सकती है, चट्टान बनने के बाद तो बहुत मुश्किल हो जायेगी। सब के सब अकेले रह जायेंगे। साथ मेँ रहेगा अवसाद। अकेलापन। उदास दिन और बेचैन रातें। कुछ नहीं बचेगा, सिवाये खूबसूरत यादों के। इससे पहले कि देर हो जाये, फिर से पीछे जाने की कोशिश की जाये। [समाप्त]
