
श्रीगंगानगर (भटनेर एक्सप्रेस) आधुनिक श्रीगंगानगर के विकास पुरुष और राजनीति के दिग्गज पूर्व मंत्री बाऊ राधेश्याम अक्सर कहा करते थे कि-मैं श्रीगंगानगर शहर को चंडीगढ़ का बच्चा बनाना चाहता हूँ। यह कोई भावुकता भरी बात नहीं थी, बल्कि उनके विजन का हिस्सा था। उनके कार्यकाल में ही वर्ष 1981-82 में श्रीगंगानगर शहर का पहला मास्टर प्लान लागू हुआ था।इसी मास्टर प्लान के नक्शे के अनुसार जवाहरनगर, सुखड़िया सर्किल और सुखड़िया नगर जैसे पाश इलाके को धरातल पर उतारा गया। इन इलाकों में आज भी नियोजित सेटबैक, चौड़ी सड़कें और सुंदर पार्क देखे जा सकते हैं। यदि पूरे श्रीगंगानगर की बसावट उसी मास्टर प्लान के अनुरूप हुई होती, तो आज शहर वाकई चंडीगढ़ की तरह सुव्यवस्थित, सुंदर और आदर्शनगर बन चुका होता।
शहर की नियोजित बसावट के लिए नगर विकास न्यास (यूआईटी) की स्थापना भूमि अधिग्रहण और मास्टर प्लान को अमली जामा पहनाने के उद्देश्य से की गई थी। दुर्भाग्यवश, यह संस्था अपने उद्देश्य में विफल रही। मास्टर प्लान की कई महत्वपूर्ण सड़कें आज भी कागजों में कैद हैं, जबकि शहर अनियोजित विकास की चपेट में फंसता जा रहा है।
भाजपा नेता एवं पार्षद सुरेंद्र स्वामी एडवोकेट ने पूर्व मंत्री बाऊ राधेश्याम के श्रीगंगानगर के विकास में दिए गए योगदान को याद करते हुए कहा कि आज कहा कि मास्टर प्लान की सड़कों को धरातल पर उतारने के लिए संघर्ष समितियां बनानी पड़ रही हैं। सालों-साल के संघर्ष के बाद भी सड़कें बन पाती हैं।स्वामी ने कहा-नेताओं और प्रशासन की उदासीनता का शिकार मास्टर प्लान का कत्ल हर रोज हो रहा है। यह किसी एक पार्टी या व्यक्ति विशेष की बात नहीं है, बल्कि समूचे सिस्टम की समस्या है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 से स्थानीय लोगों ने मिनी बाईपास जस्सा सिंह मार्ग के निर्माण के लिए निरंतर प्रयास किए। कई किसान परिवारों ने करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन निःशुल्क समर्पित की। सैकड़ों लोगों ने अपने मकान और दुकानें तोड़कर सड़क की सीमा के लिए जगह दी। इन बलिदानों के बाद ही मास्टर प्लान का पहला मिनी बाईपास धरातल पर उतर सका।त्वपूर्ण सड़कें निर्माण का इंतजार कर रही हैं।
सुरेंद्र स्वामी ने जोर देकर कहा कि जब तक आम शहरी नागरिक मास्टर प्लान की सड़कों के निर्माण के लिए आगे नहीं आएंगे, तब तक प्रशासन इन्हें प्राथमिकता नहीं देगा। यदि हम चाहते हैं कि शहर मास्टर प्लान के अनुरूप विकसित हो, तो आम जनता को खुद इसकी मांग धरातल पर करनी होगी। इसके लिए मास्टर प्लान को बारीकी से समझना होगा। तभी यह प्रशासन के लिए प्राथमिकता बन पाएगा।
