नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में जारी विरोध प्रदर्शनों पर अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर है। दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों में विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और विभिन्न समूहों के प्रदर्शन के बीच वैश्विक मीडिया में भारत की चुनाव व्यवस्था की विश्वसनीयता और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में मुख्य रूप से विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मुद्दा है। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हुए हैं। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने और मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए यह प्रक्रिया आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा
टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्रिटेन के द इकोनॉमिस्ट, बीबीसी और फाइनेंशियल टाइम्स सहित कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भारत में चल रहे घटनाक्रम पर रिपोर्ट और विश्लेषण प्रकाशित किए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि बड़ी संख्या में भारतीय मतदाताओं से अपने मतदान अधिकार को बनाए रखने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी चर्चा की गई कि इससे गरीब और दस्तावेजों की कमी से जूझने वाले लोगों के सामने अतिरिक्त परेशानी खड़ी हो सकती है। वहीं द इकोनॉमिस्ट ने चुनाव आयोग की उस पुरानी छवि का उल्लेख किया, जिसमें आयोग को राजनीतिक दलों के प्रभाव और चुनावी अनियमितताओं पर नियंत्रण रखने वाली संस्था के रूप में देखा जाता रहा है। रिपोर्ट में SIR के बाद मतदाता सूची में हुए बदलावों को लेकर उठे सवालों का भी जिक्र किया गया है।
बीबीसी ने ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर किया फोकस
बीबीसी की रिपोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, लंबे प्रशासनिक करियर के बाद कुमार अब ऐसी स्थिति में हैं, जहां उन्हें उस संस्था के फैसलों और कार्यप्रणाली का बचाव करना पड़ रहा है, जिसका वे नेतृत्व कर रहे हैं। ज्ञानेश कुमार लंबे समय तक सरकारी प्रशासन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और कई संवेदनशील सरकारी परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं। मौजूदा विवाद ने उन्हें सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई भी चर्चा में
भारत में चुनाव आयोग के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों का हिस्सा बनी है। दिल्ली समेत कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस द्वारा बैरिकेडिंग किए जाने की खबरें सामने आई हैं। फाइनेंशियल टाइम्स ने भी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई, हिरासत और विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते दायरे का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारी मतदाता सूची में बदलाव रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
विपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप
विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का असर बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं पर पड़ सकता है। विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग से प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों का समाधान करने की मांग की है। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को सही और अद्यतन रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आयोग ने पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल करने तथा गलती से बाहर रह गए लोगों के मामलों पर कार्रवाई की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा
मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के कुछ फैसलों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अदालत ने संबंधित याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। इससे पूरे विवाद को लेकर न्यायिक समीक्षा का पहलू भी जुड़ गया है। इस बीच विपक्षी दलों और अन्य समूहों के प्रदर्शन जारी हैं। 6 अक्टूबर को भी विपक्षी सांसदों ने दिल्ली में चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च करने का प्रयास किया। पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोका और कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।
भारत की चुनाव व्यवस्था पर वैश्विक निगाह
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी चुनाव प्रक्रिया को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। ऐसे में मतदाता सूची, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चल रही मौजूदा बहस का अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से आना इस पूरे घटनाक्रम के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है। फिलहाल विवाद का केंद्र SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची से हटाए गए नामों, प्रभावित मतदाताओं के अधिकार और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठे सवाल हैं। आने वाले दिनों में न्यायिक प्रक्रिया, चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और राजनीतिक दलों के अगले कदम से इस विवाद की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।
