
हनुमानगढ़ जिले में धान की पराली या अन्य फसल अवशेष को जलाकर वातावरण में धुआं फैलाने वाले किसानों पर कार्रवाई की जाएगी। जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट डॉ. खुशाल यादव ने आदेश जारी करते हुए प्रत्येक ब्लॉक में उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में ब्लॉक स्तरीय पराली सुरक्षा दल गठित करने के निर्देश दिए हैं। इन दलों द्वारा पराली जलाने की घटनाओं पर सतर्क निगरानी रखी जाएगी।
दोषी किसानों से जुर्माना वसूल कर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। ब्लॉक स्तरीय दल में उपखंड अधिकारी नोडल अधिकारी होंगे, जबकि उनके साथ उप पुलिस अधीक्षक, बीडीओ, तहसीलदार और कृषि विभाग के सहायक कृषि अधिकारी/सहायक निदेशक (कृषि विस्तार) को शामिल किया गया है। ग्राम स्तरीय टीम में ग्राम विकास अधिकारी, पटवारी और कृषि पर्यवेक्षक संयुक्त रूप से कार्य करेंगे। संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार) डॉ. प्रमोद कुमार यादव ने बताया कि उत्तर एवं मध्य भारत में हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ता है। 2015 में एनजीटी ने पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। किसानों को सलाह दी गई है कि वे कस्टम हायरिंग सेंटरों पर उपलब्ध बेलर आदि मशीनों का उपयोग कर फसल अवशेष प्रबंधन करें। कृषकों से पराली जलाने की बजाए इसे जुताई के समय मिट्टी में दबाने की अपील की गई है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के राज्यों में प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा भारत सरकार के पराली जलाने पर पर्यावरणीय प्रतिकर नियम 2023 (संशोधन 6 नवम्बर, 2024) के तहत दोषी किसानों पर जुर्माना लगाया जाएगा। 2 एकड़ से कम भूमि पर पराली जलाने पर 5 हजार रुपए, 2 से 5 एकड़ तक भूमि पर 10 हजार रुपए, 5 एकड़ से अधिक भूमि में पराली जलाने पर 30 हजार रुपए जुर्माना वसूला जाएगा।
कृषि संयुक्त निदेशक द्वारा सैटेलाइट आधारित फसल अवशेष जलाने की लोकेशन (अक्षांश-देशांतर) का भौतिक सत्यापन कर रिपोर्ट जिला कलेक्टर को भेजी जाएगी। इसके उपरांत जिला कलेक्टर द्वारा राजस्व अधिकारियों के माध्यम से इंवायरमेंटल कम्पनसेटरी चार्ज (ईसीसी) की वसूली करवाई जाएगी। जिले में अब तक पांच किसानों से ईसीसी की वसूली की जा चुकी है, जो पराली जलाने के दोषी पाए गए।
^कलेक्टर डॉ. खुशाल यादव ने कहा कि किसान पराली को न जलाएं, बल्कि पर्यावरण हितैषी विकल्प अपनाएं। फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों, पशुओं के चारे, कंपोस्टिंग एवं जैविक खाद तैयार करने जैसे उपाय न केवल पर्यावरण को बचाते हैं बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी सहायक हैं।
