
पाकिस्तान सीमा पर स्थित हिंदूमलकोट के पुराने ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन को रेलवे म्यूजियम बनाने की मांग
श्रीगंगानगर (भटनेर एक्सप्रेस) जिले में भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित हिंदूमलकोट गांव के पुराने और ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन को रेलवे म्यूजियम में परिवर्तित करने की मांग उठी है। क्षेत्रीय रेल उपभोक्ता परामर्शदात्री समिति (जेडआरयूसी) के पूर्व सदस्य तथा रेलवे मामलों के विशेषज्ञ भीमप्रकाश शर्मा ने इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ओएसडी और राजस्थान प्रदेश कुश्ती संघ के अध्यक्ष राजीव दत्ता को ज्ञापन सौंपा। राजीव दत्ता के श्रीगंगानगर आगमन के दौरान हिंदूमलकोट गांव भ्रमण के अवसर पर भीमप्रकाश शर्मा ने ज्ञापन के माध्यम से अवगत कराया कि पुराना रेलवे स्टेशन आज भी काफी अच्छी स्थिति में मौजूद है। मुख्य स्टेशन भवन की मरम्मत कर उसे आकर्षक रूप दिया जा सकता है। यहां माल गोदाम, पुराना रेलवे सिग्नल सिस्टम-हालांकि कुछ खंडहर जैसी स्थिति में है और अन्य संरचनाएं उपलब्ध हैं। शर्मा ने सुझाव दिया कि पुराने भाप से चलने वाले रेल इंजन और डिब्बों को यहां लाकर प्रदर्शित किया जाए। इससे बॉर्डर क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों के लिए एक नया आकर्षण केंद्र तैयार हो सकेगा।
ऐतिहासिक महत्व और पृष्ठभूमि
हिंदूमलकोट एक प्राचीन गांव है। भारत-पाक विभाजन से पहले नई दिल्ली से बठिंडा होते हुए रेलगाड़ियां हिंदूमलकोट के रास्ते कराची तक जाती-आती थीं। विभाजन के कई वर्षों बाद भी यही मार्ग सक्रिय रहा। अंतर केवल इतना था कि बठिंडा से आने वाली गाड़ियां हिंदूमलकोट स्टेशन पर रुक जाती थीं और आगे पाकिस्तानी लोको पायलट गाड़ी ले जाते थे। इसी प्रकार पाकिस्तान से आने वाली गाड़ियों को यहां रोका जाता था और भारतीय पायलट आगे ले जाते थे। पुराने रेलवे स्टेशन के सामने आज भी पुराना ट्रैक मौजूद है, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा की जीरो लाइन तक जाता है।

यहां पुरानी रेलवे गुमटी भी बनी हुई है। बीकानेर रियासत के समय हिंदूमलकोट एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मंडी थी। इसके व्यापारिक संबंध बहावलपुर, कराची, लाहौर, पेशावर तथा अफगानिस्तान में काबुल और कंधार तक फैले हुए थे। चना व्यापार में इस मंडी की विशेष पहचान थी। अंग्रेजी शासनकाल में दिल्ली को कराची से जोड़ने वाले तीन रेल मार्गों में से एक यही मार्ग था।
विभाजन के बाद की स्थिति
भारत-पाक विभाजन के कुछ दिनों बाद हिंदूमलकोट-बहावलपुर रेल मार्ग बंद कर दिया गया। पाकिस्तान ने अपने क्षेत्र में ट्रैक उखाड़ दिया, जबकि भारतीय तरफ 1969 तक दिल्ली-बठिंडा गाड़ियां चलती रहीं। सुरक्षा कारणों से 1970 में स्टेशन को 3 किलोमीटर दूर नई जगह स्थानांतरित कर दिया गया। पुराना स्टेशन भवन आज भी बीते दिनों की याद दिलाता है।
राजीव गांधी काल की योजना
हिंदुमलकोट के पुराने वासियों के अनुसार राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में रेलवे और कस्टम अधिकारियों ने गांव में कैंप लगाकर सर्वे किया था। पुराने स्टेशन से नए स्टेशन तक की जगह को चिन्हित किया गया था। अटारी स्टेशन की तर्ज पर यहां भारत-पाकिस्तान व्यापारिक आवागमन केंद्र बनाने की योजना तैयार हुई थी। लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद यह योजना रुक गई। लगभग 14 वर्ष पहले यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदारा पार्टी) के संस्थापक प्रसिद्ध ग्वार गम उद्योगपति बीडी अग्रवाल और उनकी पुत्री कामिनी जिंदल के चुनाव घोषणा-पत्र में भी हिंदूमलकोट को अटारी और मुनाबाव की तर्ज पर व्यापारिक रेल आवागमन शुरू करने का वादा शामिल था।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
वर्तमान में पुराना रेलवे स्टेशन सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अधीन है। बीएसएफ की बॉर्डर पोस्ट स्टेशन के ठीक साथ लगती है। आम लोगों के लिए यह क्षेत्र बंद है और अवलोकन के लिए उच्च अधिकारियों की अनुमति जरूरी है। बीएसएफ पोस्ट को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का प्रयास पहले किया गया था, लेकिन रखरखाव की कमी से वह खस्ताहाल हो गया है। यदि पुराने स्टेशन को रेलवे म्यूजियम बनाया जाए तो हिंदूमलकोट पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। जिला प्रशासन की पर्यटन समिति की बैठकों में अक्सर इस बॉर्डर क्षेत्र को विकसित करने के प्रस्ताव पारित होते रहे हैं, लेकिन अमल अभी तक अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ है।पर्यटन विकास से स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। वर्तमान में बॉर्डर क्षेत्र होने के कारण नशीले पदार्थों की तस्करी के मामले आम हैं और कई युवा इसमें फंस रहे हैं। पर्यटन केंद्र बनने से यह समस्या भी कुछ हद तक कम हो सकती है।यह मांग यदि पूरी होती है तो हिंदूमलकोट न केवल ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करेगा बल्कि सीमा क्षेत्र के पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा प्रदान करेगा।
नामकरण का इतिहास
इतिहास के अनुसार हिंदूमलकोट को पहले औडकी के नाम से जाना जाता था। 1914 में बीकानेर रियासत द्वारा हदबंदी के दौरान रियासत के दीवान हिंदूमल इस क्षेत्र में आए। यहां बीमार पड़ने के बाद उनका निधन हो गया। महाराजा गंगासिंह ने अपने दीवान की स्मृति में मंडी का नाम औडकी से बदलकर हिंदूमलकोट रखा था।
