
संचालक मंडल और अध्यक्ष को क्लीन चिट, सिस्टम की मिलीभगत का बड़ा सवाल
श्रीगंगानगर (भटनेर एक्सप्रेस) जिले में सहकारिता जगत में एक बार फिर बड़ा घोटाला सामने आया है। श्रीकरणपुर उपखंड क्षेत्र की 4-ओ ग्राम सेवा सहकारी समिति में 50 लाख रुपये से अधिक की वित्तीय अनियमितताएं पुष्टि हो चुकी हैं। सहकारी विभाग ने इस मामले में केस दर्ज कर लिया है और राशि वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस समिति के अध्यक्ष और पूरे संचालक मंडल को क्लीन चिट दे दी गई है। बीकानेर निवासी विजयकुमार की शिकायत पर रजिस्ट्रार (सहकारी समितियां) जयपुर ने मामले को गंभीरता से लिया। जोनल एडिशनल रजिस्ट्रार बीकानेर के निर्देश पर उप रजिस्ट्रार श्रीगंगानगर ने राजस्थान सहकारी सोसाइटी अधिनियम 2001 की धारा 55 के तहत जांच शुरू की। सहकारी निरीक्षक ऑडिट चंद्रशेखर मुंडासिया ने जांच की और दिसंबर 2025 में रिपोर्ट सौंपी। अप्रैल 2026 में जारी जांच परिणाम में कुल 50 लाख 11 हजार 482 रुपये की गड़बड़ी सामने आई। इसके बाद धारा 57(1) के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया गया। जांच में ब्याज राशि में 13 लाख 57 हजार 886 रुपये की हानि तथा अन्य मदों में 34 लाख 64 हजार 884 रुपये और 1 लाख 88 हजार 732 रुपये की अनियमितताएं पाई गईं। वर्तमान व्यवस्थापक रामपाल मान और पूर्व व्यवस्थापक अशोक चंदवानी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इनसे पूरी राशि वसूली जाएगी। आगे की जांच सहकारी निरीक्षक कार्यकारी मुकेश मीणा को सौंपी गई है। चक 4-ओ सहकारी समिति प्रभावशाली सहकारिता नेता लखविंद्रसिंह बराड़ उर्फ लखियां के नेतृत्व वाली है। लखियां कई बार इस समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। वे श्रीकरणपुर क्रय-विक्रय सहकारी समिति के अध्यक्ष, जिला सहकार संघ के संचालक मंडल सदस्य और गंगमूल डेयरी के पूर्व डायरेक्टर भी रह चुके हैं। जांच रिपोर्ट में संचालक मंडल को कर्तव्यहीनता का जिम्मेदार नहीं ठहराया गया जबकि 2018 से 2024 तक सात साल तक बैंक स्तर से वार्षिक निरीक्षण नहीं करवाया गया। आदर्श उपनियमों के अनुसार संचालक मंडल को अंकेक्षण रिपोर्ट पर विचार करना, पूर्ति रिपोर्ट तैयार करना और आमसभा में अनुमोदित कराना चाहिए था। गलत लाभ के आंकड़ों वाली ऑडिट रिपोर्ट को भी आमसभा में पास कराया गया। इसके बावजूद अध्यक्ष और बोर्ड को पूरी क्लीन चिट मिल गई। इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ छोटे कर्मचारियों पर सारा दोष डाला जा रहा है तो दूसरी तरफ बड़े नेता और संचालक मंडल बच निकल रहे हैं। समिति को 500 एमटी, 250 एमटी और 100 एमटी क्षमता के गोदाम तथा कस्टमर हायरिंग सेंटर की सुविधाएं मिलीं। वित्तदाता बैंक और सहकारिता विभाग ने सात साल की अनियमितताओं के बावजूद सहयोग किया। क्या यह बड़े नेता के प्रभाव का नतीजा है?यह मामला सहकारिता क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर कर रहा है। सहकारी विभाग को अब सिर्फ राशि वसूल नहीं करनी चाहिए बल्कि संचालक मंडल की जवाबदेही भी तय करनी चाहिए। मुकेश मीणा की जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। आम सदस्यों और किसानों को उम्मीद है कि इस बार सिस्टम की मिलीभगत नहीं चलेगी और दोषी किसी भी स्तर पर नहीं बचेंगे।
